
पुसौर, 20 अप्रैल 2026 – नगर पंचायत पुसौर में सरकारी संपत्ति की बर्बादी का बड़ा मामला सामने आया है। वर्ष 2008 में नगर पंचायत की स्थापना के बाद से अब तक कचरा उठाने, पेयजल व्यवस्था और प्रकाश व्यवस्था के लिए खरीदे गए एक करोड़ रुपये से अधिक के वाहन व मशीनरी कबाड़ में तब्दील हो चुके हैं। हैरानी की बात यह है कि शासन के नियमानुसार इनमें से ज्यादातर वाहनों की उम्र अभी बाकी है, फिर भी वे कबाड़ बनकर सड़ रहे हैं।
3 ट्रैक्टर, शौचालय वाहन, ई-रिक्शा सब कबाड़
जानकारी के मुताबिक नगर पंचायत ने स्थापना के बाद घर-घर से कचरा उठाने के लिए ट्रैक्टर, डस्टबिन, ई-रिक्शा, शौचालय साफ करने वाला चारपहिया वाहन, पेयजल के लिए नलकूप खनन, चलित पानी टंकी, मोटर, पाइप लाइन बिछाने और प्रकाश व्यवस्था के लिए विद्युत पोल व भारी बल्ब आदि खरीदे थे। इनमें से 3 ट्रैक्टर, एक शौचालय साफ करने वाला वाहन, कई कचरा खींचने वाले रिक्शा, कई विद्युत खंभे, नलकूप पंप-पाइप सहित एक करोड़ से अधिक की सामग्री अब नष्ट हो चुकी है और कबाड़ में पड़ी है।
15 साल उम्र, फिर भी पहले ही कबाड़
शासन के नियमानुसार वाहनों की सामान्य आयु 15 वर्ष होती है। नलकूपों की आयु उपयोग के आधार पर तय होती है। इस लिहाज से नगर पंचायत को शासन द्वारा प्रदाय किए गए ज्यादातर वाहनों की आयु अभी शेष है, लेकिन रखरखाव के अभाव में वे कबाड़ हो चुके हैं।
विडंबना देखिए—निजी तौर पर कोई व्यक्ति ट्रैक्टर या नलकूप खरीदता है तो उसका सालों-साल रखरखाव कर उपयोग करता है। लेकिन नगर पंचायत में मेंटेनेंस के नाम पर बजट खर्च होने के बावजूद सारी मशीनरी कबाड़ हो रही है।
मेंटेनेंस का पैसा कहां गया?
पड़ताल में सामने आया है कि मेंटेनेंस के लिए निकाला गया खर्च संबंधित वाहन या मशीन में उपयोग ही नहीं किया जाता। नतीजा—वाहन कबाड़ में तब्दील हो जाता है। सालों-साल उसे यूं ही पड़ा रहने दिया जाता है, जिससे वह कबाड़ के भाव में भी नहीं बिकता और जंग लगकर मिट्टी में मिल जाता है। शासन द्वारा समय पर नीलामी भी नहीं की जाती, जिससे यह स्थिति बनती है।
सीएमओ बोले- मेरे कार्यकाल में नहीं हुई खरीदी
इस पूरे मामले पर मौजूदा सीएमओ ललित साहू का कहना है कि “मेरे कार्यकाल के बीच कोई वाहन नहीं खरीदा गया है। पिछले समय का एक ट्रैक्टर और कुछ ई-रिक्शा हैं जो चालू हालत में हैं।”
हर सरकारी दफ्तर का यही हाल
यह स्थिति सिर्फ पुसौर नगर पंचायत की नहीं है। इस तरह की लापरवाही लगभग हर शासकीय कार्यालय में देखने को मिलती है। देश और प्रदेश की आर्थिक सुरक्षा के मद्देनजर शासन का ध्यान इस ओर आकर्षित किया जाना आवश्यक है।
सवाल अब भी बरकरार
जब मेंटेनेंस के लिए हर साल बजट जारी होता है तो वाहन कबाड़ क्यों हो रहे हैं? समय पर नीलामी क्यों नहीं होती? क्या जानबूझकर सरकारी संपत्ति को कबाड़ बनाकर नए खरीदी का रास्ता साफ किया जा रहा है? इन सवालों के जवाब शासन-प्रशासन को देने होंगे, वरना जनता की गाढ़ी कमाई यूं ही कबाड़ में तब्दील होती रहेगी।
