
प्रथा, परंपरा और मान्यताओं के परिपेक्ष्य में विपरीत परिस्थिति में भी पुसौर मूर्तरूप देते आ रहा अपने सार्वजनिक मांगलिक कार्यक्रमों को, कुछ कहते है कि धीरे व लंगड़ा के चलने से बेहतर है रुक जाना, लेकिन समय है कि रुकता नहीं वो अपने गति से चलता रहा है और जिसने भी मंदिर या उसके प्रांगण पहुंचा तो चाहे अनचाहे मुंह से निकल जाता हरे राम हरे राम,,,,। रीझ भजो या खीज भजो भजना तो पड़ेगा ही क्योंकि यही सत्य है और हमारे पूर्वजों द्वारा दिए कर्तव्यों को पूरा जो करना है।
पुसौर के जगन्नाथ मंदिर में पिछले कई वर्शो से माघ चतुर्दषी के दिन अश्टप्रहरी नाम यज्ञ का शुभारंभ होकर पुर्णिमा के दिन उसका समापन होते हुये आ रहा है इसी कडी में बिते माघ चतुर्दषी के दिन हरे राम हरे राम राम राम हरे। हरे कृश्ण हरे कृश्ण कृश्ण कृश्ण हरे हरे।। महामंत्र के अखंड जाप संकीर्तन्य स्वरूप में प्रारंभ हो चुका है। जिसमें वार्ड वासी अपने अपने पारी में जाकर नाम संकीर्तन्य का आनंद लेते हुये अपनी कर्तव्य का भी निर्वहन कर रहे हैं। नगर उपाध्यक्ष उमेष साव अपने इसी कर्तव्य का निर्वहन किया और वहां अपेक्षित व्यवस्था को ध्यान में रखते हुये यथोचित मार्गदर्षन दिया। ज्ञात हो कि समापन के अवसर पर आसपास के कीर्तन पार्टी आकर यहां भक्तिमय वातावरण के श्रृजन में महत्वपुर्ण भुमिका निभाते रहे हैं वहीं पुसौर के मंदिर परिसर के कीर्तन पार्टी दधिभांड भंजन कार्यक्रम में नाटकीय रूप देते हुये भगवान कृश्ण की आराधना करते हैं जिसमें उपस्थित श्रद्धालु दीर्घा के जरिये ये आये दिन वाहवाही बटोरता रहा है।
