
उंगली रखने की जमीन पा लेने पर अपना पूरा शरीर व परिवार को स्थापित कर बन जा रहे वहां के भू स्वामी, स्थानीय राजनीति और जवाबदार लोगों के चुप्पी साधने से फल फूल रहा यह व्यापार और बना लिए लाखों की पूंजी ।
पुसौर ही नहीं बल्कि समुचे प्रदेष में आजादी के बाद से षासन का षायद यह फंडा रहा है कि पहले लोग अपने को जरूरतमंद दिखाकर स्थानीय जनप्रतिनिधि एवं राजस्व अधिकारियों से षासकीय भूमि को अवैध कब्जा करते हैं जिसके राजस्व विभाग के कार्यवाही में उनसे आंषिक जुर्माना लिया जाता है और लंबे समय तक उसके कब्जे में होने से उसमें वह अपने स्वामित्व का दावा भी करता है। ऐसा स्थिति पुसौर के प्रायः बेषकीमती और अन्य षासकीय भुखंडों का रहा है जिसमें लोग काबिज हैं और वर्तमान में षासन के पास जनहित में किसी निर्माण कार्य के लिये अब कोई भुखंड नहीं मिल रहा है। पुसौर में कुछ जमीन तो ऐसे हैं जहां आजादी के बाद से षासकीय कार्यालय बने हुये हैं वह भूमि आज के स्थिति में निजी कहला रहे हैं और जो षासकीय हैं उसमें लंबे समय तक अवैध कब्जा होने से संबंधित भूमि निजी हो चुका है। यह स्थिति राजस्व विभाग के लंबे समय के लापरवाही को बयान करने के साथ साथ शासन प्रशासन में रहे लोगों के अनदेखी को भी बयान कर रहा है। पुसौर जनपद कार्यालय के बगल में भाठिया कालोनी के सामने एक भुखंड इसी तरह का है जिसमें कुछ साल पहले षासन द्वारा आवासहीनों को पं. दीनदयाल आवास योजना के तहत भुखंड आबंटित किया था जबकि वह जमीन किसी के द्वारा कब्जा है। लगभग 7-8 साल पहले इसी भुखंड का लगभग 3 डिसमिल जमीन किसी ने खरीदा, उसमें मकान बनाया और उसे बेच दिया जहां होटल चल रहा है अब उसी से लगकर पुनः षायद इसी तरह का सौदा बताया जा रहा है जिसमें मिट्टी पाटा जा रहा है जहां फिर से मकान बनने के संकेत मिल रहे हैं। ज्ञात हो कि षासन द्वारा आवास के तहत जितने भुखंड वितरित किये गये और उसमें आवास के लिये अनुदान राषि दिये गये उसमें से कुछ ही उसके वास्तविक हितग्राही है बाकि सब बेचकर पुंजी बना चुके हैं। इस तथ्य को स्थानीय जनप्रतिनिधि के साथ साथ षासन प्रषासन में रहे लोग बखुबी जानते हैं लेकिन अपनी राजनीति की चमक कहीं फिकी न पड जाये इसलिये नहीं कोई मुखर होकर सामने आते है और नहीं इस पर कार्यवाही होती है। यहां यह बताना लाजिमी होगा जिसने हिम्मत करके षासकीय भुखंडों को कब्जा कर खेती किया, दुकान और आवास बनाया वह अब तक आर्थिक दृश्टि से बहुत आगे जा चुका है वहीं जिसने अपने स्वाभिमान को बरकरार रखते हुए किराया लिया अथवा कहीं षासकीय ठेला खोमचा लगाकर अपनी आजिविका चला रहे हैं उस पर षासन का कोई दायित्व नहीं है और आज उसे सौदर्यीकरण के नाम से हटना पड़ रहा है। उल्लेखनीय है कि बोरोडीपा, छींच रोड, कोसमंदा रोड, सहित अन्य कई जगहों के शासकीय भूमि जिसमें जल चर, गौचर, आबादी, छोटे झाड़ जंगल सहित अन्य प्रकार के सारे भूमि अवैध कब्जा के शिकार हो चुके हैं, अवैध कब्जा का बहरहाल ये आलम है कि खाली पड़े निजी भूमि को भी अपने कब्जे में ले लिए हैं और आज संबंधित भू स्वामी को अपने भूमि को अपने कब्जे में लेने के लिए पापड़ बेलना पड़ रहा है जिसमें प्रशासन भी मौन है।9
