
72 फैक्ट्रियों से पहले ही बेहाल रायगढ़ में बढ़ेगा जहर, 20 गांवों की 30 हजार आबादी में होगा – अब सांस महंगी
झारसुगुड़ा की रूंगटा संस प्राइवेट लिमिटेड अब रायगढ़ के गढ़उमरिया-दर्रामुड़ा में 814.5 करोड़ की लागत से अपना साम्राज्य फैलाने जा रही है। कंपनी मौजूदा 2.513 हेक्टेयर प्लांट के बगल में 11.029 हेक्टेयर अतिरिक्त जमीन पर DRI, स्टील मेल्टिंग शॉप, रोलिंग मिल, फेरो अलॉय यूनिट और 50 मेगावाट का कैप्टिव पावर प्लांट लगाना चाहती है। पर्यावरण मंजूरी की जनसुनवाई के बाद से ही 20 गांवों में विरोध शुरू हो गई है।

परियोजना एक नजर में
मद क्षमता/मात्रा
कुल लागत 814.5 करोड़ रुपये
कुल जमीन 11.029 हेक्टेयर
स्पॉन्ज आयरन/DRI 2.24 लाख टन/साल
स्टील मेल्टिंग शॉप 2.24 लाख टन/साल
रोलिंग मिल 2 लाख टन/साल
फेरो अलॉय 42,900 टन/साल
कैप्टिव पावर 50 मेगावाट
पानी की खपत 2.145 लाख लीटर/दिन
फ्लाई ऐश 200 टन/दिन
पावर प्लांट उत्सर्जन 10 टन/दिन
SMS उत्सर्जन 15 टन/दिन
रायगढ़ पर और बढ़ेगा औद्योगिक दबाव
सम्पूर्ण जिला पहले से ही 6 दर्जन से ज्यादा स्टील, स्पंज आयरन और ताप विद्युत संयंत्रों के कारण प्रदूषण संकट से जूझ रहा है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने रायगढ़ को नॉन अटेनमेंट सिटी घोषित किया है। यहां PM10 का स्तर 150 माइक्रोग्राम/घनमीटर है, जबकि मानक 60 है। PM2.5 भी दोगुना है। ऐसे में 50 मेगावाट के नए कैप्टिव पावर प्लांट से पर्यावरणीय दबाव और बढ़ने की आशंका है।
50 मेगावाट प्लांट रोज 400 टन कोयला फूंकेगा। इससे 4 टन सल्फर डाइऑक्साइड और 3 टन नाइट्रोजन ऑक्साइड रोज हवा में घुलेगा। हर दिन 200 टन फ्लाई ऐश निकलेगी। महीने में 6000 टन राख कहां डंप होगी, इसका जवाब कंपनी के पास नहीं है।
जनसुनवाई में हंगामा होने की आशंका : ग्रामीणों के सवाल और कंपनी के गोलमोल जवाब होने पर जनसुनवाई में गढ़उमरिया, दर्रामुड़ा, समेत 20 गांवों के लोगों ने विरोध दर्ज कराने की फिराक में है । स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों का मानना है कि जनसुनवाई केवल औपचारिक प्रक्रिया न बनकर पर्यावरण, जल, कृषि और जनस्वास्थ्य से जुड़े वास्तविक मुद्दों पर खुली चर्चा का मंच बननी चाहिए।
पूछता है रायगढ़: जनसुनवाई में उठे 6 बड़े सवाल
- क्या प्रस्तावित परियोजना के लिए वृहद आवास या वन भूमि लेना तो नहीं पड़ेगा?
- क्या स्टील, स्पंज आयरन और फेरो अलॉय इकाइयों से निकलने वाला धुआं, गैस और राख की नियमित जांच होगी?
- क्या परियोजना के कारण आसपास की कृषि भूमि, जल स्रोतों और ग्रामीण आबादी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा?
- क्या स्थानीय ग्रामीणों को रोजगार में प्राथमिकता मिलेगी या सिर्फ बाहरी लोगों को?
- यदि भविष्य में पर्यावरणीय मानक टूटते हैं तो उसकी जवाबदेही किसकी होगी?
- क्या जलस्तर और वृक्षारोपण कार्यों का स्वतंत्र एवं नियमित ऑडिट होगा?
दस्तावेजों में क्या कहती है कंपनी
कंपनी के प्रस्तावित दस्तावेजों के अनुसार विस्तार परियोजना से आधुनिक औद्योगिक अवसंरचना विकसित होगी, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे तथा क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों को गति मिलेगी। दस्तावेजों में प्रदूषण नियंत्रण, हरित पट्टी विकास और पर्यावरण प्रबंधन उपायों का उल्लेख किया गया है। कंपनी का दावा है कि यह “उद्योगों की उत्कृष्ट मिसाल है”।
हालांकि इन दावों की वास्तविक क्रियान्वयन और जमीनी परिणामों पर आम जन व जनसुनवाई के दौरान सामने आने वाले तथ्यों एवं आपत्तियों के बाद ही स्थिति साफ हो सकेगी।
ग्राउंड से आवाज: “पहले ही दम घुट रहा है”
दर्रामुड़ा के लोगो का कहना हैं, “पहले वाली चिमनी से ही घर में काला पाउडर जम जाता है। अब 50 मेगावाट की नई चिमनी लगेगी तो सांस लेना भी मुश्किल हो जाएगा।”
गढ़उमरिया के युवा किसानों का सवाल है, “814 करोड़ के प्रोजेक्ट में कितने लोकल लड़कों को नौकरी देंगे? 10-20 गार्ड की नौकरी देकर हजारों लोगों की खेती मार देंगे।”
कानूनी पेंच: EIA रिपोर्ट पर सवाल
वकील लोग बताते हैं कि कंपनी की EIA रिपोर्ट में “Cumulative Impact Assessment” यानी संचयी प्रभाव का आकलन गायब है। नियम कहता है कि रायगढ़ जैसे प्रदूषित क्षेत्र में नया प्रोजेक्ट लाने से पहले कुल प्रदूषण भार नापना जरूरी है। रिपोर्ट में 20 गांवों की जनसंख्या, बीमारियों का डेटा, फसल नुकसान का आंकलन नहीं है।
पर्यावरणविद् और पर्यावरण प्रेमी चेताते हैं, “50 मेगावाट कैप्टिव पावर का मतलब है हर घंटे 2 मेगावाट से ज्यादा जहर। 5 किमी के दायरे में खेती चौपट हो जाएगी।”
अब आगे क्या
गढ़उमरिया, केशला सहित आस पास के पंचायत पदाधिकारियों ने कहा कि सभी 20 गांवों की महापंचायत बुलाई जाय। वहीं रूंगटा संस के प्रवक्ता का कहना है कि “हम सभी पर्यावरण मानकों का पालन करेंगे। 500 करोड़ का निवेश CSR में होगा। 2000 लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार मिलेगा।”
सबसे बड़ा सवाल अब भी जिंदा है: जब रायगढ़ के लोग सांस के लिए अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं, तो 50 मेगावाट का नया धुआं किस विकास की निशानी है।
