पुसौर, रायगढ़, 29 अप्रैल 2026 – स्वच्छ भारत मिशन के तहत ग्राम पंचायतों व नगरी निकायों में ओ डी एफ यानि खुला शौच मुक्त का तमगा पाने लाखों रुपये खर्च कर बनाए गए सामुदायिक शौचालय आज खंडहर बन चुके हैं। निर्माण के समय नलकूप खनन, पानी टंकी, पाइपलाइन जैसी समुचित व्यवस्था की गई थी, लेकिन रखरखाव के अभाव में ये सभी सुविधाएं अब निरुपयोगी हो गई हैं। क्षेत्र की अधिकांश पंचायतों व निकायों में यही हालात हैं। इससे शासकीय राशि के दुरुपयोग के आरोप लग रहे हैं।

जमीनी हकीकत: कहीं ताले लटके, टंकियां सूखी, बोर बंद तो कहीं दरवाजे गायब
पुसौर ब्लॉक के ग्राम छिछोर उमरिया, कोड़ातराई, सुर्री, गुडु, गोर्रा, घुघुआ, तरडा सहित दर्जनों गांवों में 2018 से 2021 के बीच 5 से 7 लाख रुपये प्रति यूनिट की लागत से सामुदायिक शौचालय बनाए गए थे। तत्कालीन समय में हर शौचालय के साथ बोरवेल, सबमर्सिबल पंप, 1000 लीटर की पानी टंकी और पाइपलाइन की व्यवस्था की गई थी। आज हालात यह है कि 80% शौचालयों में ताले लटके हैं। पानी की टंकियां खाली पड़ी हैं, बोरवेल में मोटर खराब हैं और पाइपलाइन टूट चुकी है। कई जगह शौचालय के दरवाजे-खिड़कियां गायब हैं और परिसर में झाड़ियां उग आई हैं।
सवाल कई, जवाबदार कौन?
इस स्थिति ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
1. जरूरत थी या नहीं? ग्रामीणों का कहना है कि कई गांवों में मांग के बिना ही शौचालय बना दिए गए। जहां व्यक्तिगत शौचालय पहले से थे, वहां सामुदायिक शौचालय की उपयोगिता ही नहीं थी। फिर भी लक्ष्य पूरा करने के दबाव में निर्माण करा दिया गया।
2. पंचायत नाकाम क्यों? नियमानुसार निर्माण के बाद रखरखाव की जिम्मेदारी ग्राम पंचायत की थी। सफाईकर्मी, पानी, बिजली और मरम्मत के लिए 15वें वित्त और स्वच्छ भारत मद से राशि का प्रावधान भी था। इसके बावजूद पंचायतें इन्हें सहेज नहीं पाईं।
3. कार्रवाई क्यों नहीं? सामुदायिक शौचालयों की दुर्दशा की जानकारी जनपद और जिला पंचायत के अधिकारियों को भी है। निरीक्षण में बार-बार कमी पाई गई, लेकिन आज तक किसी सरपंच-सचिव पर रिकवरी या निलंबन की कार्रवाई नहीं हुई।
शासकीय राशि का दुरुपयोग साफ दिख रहा
कई ग्राम के सामाजिक कार्यकर्ता व जागरूक लोग कहते हैं, “एक शौचालय पर औसत 6 लाख खर्च हुए। बोर, टंकी, मोटर मिलाकर 2 लाख अलग से। पूरे ब्लॉक में 89 पंचायत हैं। यदि 60 पंचायतों में भी एक-एक शौचालय बना है तो 4.8 करोड़ रुपये खर्च हुए। आज वो सब कबाड़ हो गया। इसे राशि का दुरुपयोग नहीं तो क्या कहेंगे?”किसी स्थान पर किसी सार्वजनिक कार्यक्रम के बीच यदि वहां के शौचालय पर्याप्त नहीं होगी ऐसे स्थिति में चलित शौचालय का भी व्यवस्था रहा जो एक वाहन में तैयार मिलता था, यह व्यवस्था भी अब कबाड़ में तब्दील हो गई है।
प्रशासन का पक्ष
इस संबंध में जनपद पंचायत पुसौर के सीईओ सहित अन्य अधिकारियों का कहना है कि सामुदायिक शौचालयों के संचालन-संधारण की जिम्मेदारी ग्राम पंचायत की है। उक्त व्यवस्था के दुरुस्ती हेतु समय-समय पर निर्देश जारी किए गए हैं। जहां से शिकायतें मिली हैं, वहां जांच कराई जा रही है। लापरवाही पाए जाने पर संबंधित सरपंच-सचिव के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
क्या हो सकता है समाधान
विशेषज्ञों का मानना है कि जिन शौचालयों की मरम्मत संभव है, उन्हें मनरेगा या 15वें वित्त से सुधारकर महिला समूहों को संचालन के लिए दिया जाए। उपयोगकर्ता शुल्क से रखरखाव हो सकता है। जो पूरी तरह जर्जर हो चुके हैं, उनका ऑडिट कर जिम्मेदारों से वसूली की जाए। स्वच्छता के नाम पर बनी योजनाओं का इस तरह खंडहर में बदल जाना न सिर्फ सरकारी धन की बर्बादी है, बल्कि शासन की मंशा पर भी सवाल उठाता है।
