

2004 में जब केलो डैम निर्माण कार्य प्रारंम्भ और उसमे से नहर निकालकर रायगढ़ के किसान को बारहमासी सिंचाई देने का संकल्प लिया गया था, तब उम्मीद जगी थी कि अब जिले की धरती सोना उगलेगी। 22 साल बीत गए, पर वो उम्मीद आज भी अधूरी है।
सरकारें बदलीं, समस्या वही रही
केलो नहर की कहानी वास्तव में छत्तीसगढ़ की राजनीति का आईना है। 2004 में परियोजना शुरू हुई। उसके बाद 15 साल तक बीजेपी की सरकार रही। फिर 5 साल कांग्रेस का कार्यकाल आया। और अभी पिछले 3 साल से फिर बीजेपी की सरकार है। मतलब कुल 23 साल में तीन अलग-अलग सरकारों ने केलो नहर को अपनी प्राथमिकता बताया, बजट दिया, वादे किए। पर धरातल पर नहर आज भी पूरी नहीं हो पाई।
नतीजा ये हुआ कि नहर का काम कभी तेज हुआ, कभी धीमा। कभी टेंडर बदला, कभी प्राथमिकता बदली। और इस बीच किसान वही का वही खड़ा रह गया। जिस किसान की जमीन 2004 में ली गई थी, वो आज भी रबी की फसल का सपना नहीं देख पाता। क्योंकि नहर से पानी उसके खेत तक नहीं पहुंचा।
आंकड़े क्या कहते हैं?
केलो डैम बनकर तैयार हो गया, पानी भर गया। पर कमांड एरिया 25 हजार हेक्टेयर के मुकाबले अभी 4-5 हजार हेक्टेयर में ही सिंचाई हो पा रही है। माइनर और सब-माइनर नहरों का जाल बिछना बाकी है। कई जगह पाइपलाइन लीक कर रही है, कई जगह अतिक्रमण की वजह से काम रुका है।
जल संसाधन विभाग के रिकॉर्ड में हर साल 80-90% प्रगति दिखाई जाती है। पर जमीन पर जाकर देखें तो किसान को केलो का पानी नसीब नहीं हुआ।
अब वक्त है जवाबदेही का, राजनीति का नहीं
बीजेपी हो या कांग्रेस, दोनों सरकारों के कार्यकाल में केलो नहर के लिए पैसा आया। दोनों ने वादे किए। पर नतीजा शून्य रहा। इसका मतलब साफ है – समस्या पार्टी की नहीं, सिस्टम की है। फाइलों से जमीन तक ले जाने वाली व्यवस्था में कहीं न कहीं पेंच फंसा हुआ है।
आज जरूरत इस बात की है कि राजनीति से ऊपर उठकर केलो नहर को पूरा किया जाए। 22 साल बहुत हो गए। अब हर सरकार को ये तय करना होगा कि केलो का पानी कब किसान के खेत में पहुंचेगा। चाहे वो 15 साल वाली बीजेपी सरकार हो, 5 साल वाली कांग्रेस सरकार हो, या अभी वाली 3 साल की बीजेपी सरकार।
किसान की मांग सीधी है
किसान न किसी पार्टी का झंडा उठा रहा है, न किसी नेता कोस रहा है। उसकी मांग बस एक है – “केलो का पानी हमारे खेत तक पहुंचा दो”। रबी में भी फसल लेना चाहते हैं हम। पलायन नहीं करना चाहते। सरकार से अपील है कि केलो नहर को मिशन मोड में लिया जाए। बची हुई माइनर नहरें 6 महीने में पूरी हों। लीकेज और अतिक्रमण हटाए जाएं। और किसानों को समय-सीमा के साथ बताया जाए कि उनके खेत में पानी कब पहुंचेगा। क्योंकि डैम बनाना बड़ी बात है, पर डैम का पानी किसान तक पहुंचाना उससे भी बड़ी बात है। केलो ने 22 साल इंतजार कर लिया। अब और इंतजार किसान नहीं कर सकता।
