
रायगढ़। जनपद पंचायत पुसौर की बैठकों में बीते सरकार के कार्यकाल में हर बार एक ही घोषणा दोहराई जाती थी कि – “प्रत्येक गांव में नाडेप खड्ड बनेंगे, गोबर और जैविक कचरे से खाद बनेगी, गांव स्वच्छ और समृद्ध होगा”। पर हकीकत इससे कोसों दूर है। RTI और जमीनी पड़ताल से खुलासा हुआ है कि पुसौर जनपद की 88ग्राम पंचायतों में नाडेप निर्माण महज कागजों और फाइलों तक सीमित रह गया है। धरातल पर न खड्ड दिखती है, न खाद बनती है, न किसानों को लाभ मिल रहा है।
लक्ष्य 100%, उपलब्धि 20%
स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण और मनरेगा के तहत हर गांव में कम से कम 2-2 नाडेप टांका बनाने का लक्ष्य था। जनपद पंचायत के रिकॉर्ड में सभी 88पंचायतों के प्रस्ताव, टेक्निकल स्वीकृति और राशि आहरण के आंकड़े दर्ज हैं। कागज पर लाखों रुपये खर्च भी दिखाए गए हैं। पर गांव-गांव घूमने पर हकीकत कुछ और निकली। ग्राम पड़ी गांव, कठानी, लारा, घुघुआ समेत दर्जनों गांवों में या तो नाडेप के नाम पर सिर्फ 3-4 फीट का गड्ढा खोदकर छोड़ दिया गया, या फिर जगह ही तय नहीं हुई। कई जगह जहां खड्ड बनी भी है, वहां तार फेंसिंग, छप्पर और रखरखाव के नाम पर जीरो। बारिश में गड्ढा पानी से भर जाता है, गोबर सड़ता है, मच्छर पनपते हैं। किसान इसे “बदबू वाला गड्ढा” कहकर दूर से ही निकल जाते हैं।
किसान पूछ रहा – खाद कहां है?
नाडेप का मकसद था कि गोबर, पत्ती, रसोई का कचरा सड़ाकर 3-4 महीने में जैविक खाद तैयार हो जाएगा और किसान को 5-10 रु किलो के हिसाब से खाद मिलेगा और जमीन की उर्वरा शक्ति भी बढ़ेगी कई ग्रामों के किसान कह रहे है कि “सरपंच जी ने 2 साल पहले नाडेप के लिए फोटो खिंचवाई थी। उसके बाद न कोई देखने आया, न खाद बनी।
महिला स्व-सहायता समूहो के पदाधिकारियों ने बताया कि “हमें ट्रेनिंग दी गई थी कि नाडेप चलाएंगे। पर पंचायत ने न जगह दी, न सामग्री। अब समूह की दीदियां पूछती हैं कि काम कब शुरू होगा”।
जवाबदेही तय कौन करे?
जनपद पंचायत के CEO से सवाल किया गया तो उनका जवाब था “लक्ष्य के अनुसार सभी पंचायतों में नाडेप निर्माण किया गया है जिसका मॉनिटरिंग सरपंच-सचिव करते हैं”। मतलब जिम्मेदारी टाल दी गई। वही सरपंचों का कहना है “फंड कम आया, लेबर रेट कम है, सामग्री महंगी है। ऊपर से अधिकारियों का दबाव कि फोटो भेजो”। इसी चक्कर में कई जगह पुरानी टूटी खड्ड की फोटो खींचकर 2-3 बार अपलोड कर दी गई।
88 पंचायतें, एक जैसी कहानी
पुसौर जनपद की सभी 88 ग्राम पंचायतों की स्थिति लगभग एक जैसी है:
- कागज पर पूर्ण – पोर्टल पर “काम पूर्ण” दिख रहा है
- जमीनी हकीकत शून्य – उपयोग होने वाली नाडेप 20% से कम
- रखरखाव नदारद – जहां बनी है, वहां टूट-फूट और अतिक्रमण
- लाभार्थी नाराज – किसान और समूहों को न खाद मिली, न मानदेय
जैविक खेती और गौठान को बढ़ावा देने के दावे करने वाली सरकार की योजना दम तोड़ रही है। गोबर इकट्ठा करने के लिए गौठान बने, पर खाद बनाने के लिए नाडेप नहीं बनी। तो गोबर जाएगा कहां?

सवाल सीधा है
- जब हर पंचायत में नाडेप स्वीकृत है तो 88में से कितनी कार्यशील हैं? जनपद पंचायत के पास सत्यापन रिपोर्ट क्यों नहीं?
- लाखों रुपये खर्च दिखाकर जो नाडेप बनी ही नहीं, उसका पैसा किसके जेब में गया?
- किसानों को जैविक खाद का लाभ कब मिलेगा, या नाडेप सिर्फ ऑडिट के लिए बनाई गई थी?
स्वच्छता और जैविक खेती का नारा देने वाले जनप्रतिनिधियों को अब जवाब देना होगा। क्योंकि पुसौर का किसान अब सिर्फ भाषण नहीं सुनना चाहता। उसे अपने गांव में चलता हुआ नाडेप चाहिए, कागज पर बना नाडेप नहीं।
जनपद पंचायत पुसौर और जिला प्रशासन से अपेक्षा है कि वे 88 पंचायतों का थर्ड-पार्टी सत्यापन कराएं। दोषी सचिव-सरपंच पर कार्रवाई हो और लंबित नाडेप 3 महीने में पूरे किए जाएं। वरना “नाडेप हर गांव में” का नारा एक और खोखला वादा बनकर रह जाएगा।
