

प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी योजना रेशम उद्योग को बढ़ावा देने की है। इसका उद्देश्य गांव के गरीब मजदूरों भूमिहीन परिवारों और महिला स्व-सहायता समूहों को स्थानीय स्तर पर रोजगार देना और प्रदेश की पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करना है। इसी उद्देश्य से प्रदेश के सभी रेशम केंद्रों को शासन द्वारा हर वर्ष नियमित रूप से बजट दिया जाता है। इस बजट में मजदूरी भुगतान कोकून निर्माण खाद-बीज कीटनाशक रखरखाव और अन्य आकस्मिक खर्च शामिल होते हैं। लेकिन ज़िले के तमनार रेशम केंद्र में पिछले दो वर्षों में हुए खर्चों को लेकर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
सूचना के अधिकार यानी आरटीआई के तहत मिली जानकारी और मौके पर की गई पड़ताल में कई विसंगतियां सामने आई हैं। आरोप है कि केंद्र में कागजों पर ज्यादा मजदूर दिखाकर और उत्पादन के आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर बजट का उपयोग किया गया है जबकि जमीनी हकीकत कुछ और ही है। जानकारी के अनुसार मस्टररोल के आधार पर जिन मजदूरों के नाम से भुगतान दिखाया गया है उनमें से कई मजदूरों को इस बात की जानकारी तक नहीं है कि उनके नाम पर भुगतान निकला है। जब उनसे संपर्क किया गया तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि उन्होंने केंद्र में या तो बहुत कम दिन काम किया है या बिल्कुल काम नहीं किया है। स्थानीय ग्रामीणों और प्रत्यक्षदर्शियों का भी दावा है कि तमनार केंद्र में साल भर नियमित रूप से केवल 3 से 4 मजदूर ही काम करते हुए देखे गए हैं। हां किसी-किसी विशेष सीजन में जब कीट पालन या पौधरोपण का काम अधिक होता है तब 15 से 20 मजदूरों को काम पर लगाया जाता है। इसके ठीक उलट आरटीआई से प्राप्त दस्तावेज कुछ और ही कहानी बयां करते हैं।

दस्तावेजों के अनुसार केंद्र में लगभग हर महीने 25 से 30 मजदूरों के काम करने का रिकॉर्ड दर्शाया गया है। इस हिसाब से प्रति माह मजदूरी के नाम पर 2 से 3 लाख रुपये तक का खर्च दिखाया गया है। अब सवाल यह उठ रहा है कि जब मौके पर मजदूर ही नहीं हैं तो इतना भुगतान किसे और कैसे किया गया इस भुगतान की सच्चाई क्या है इसकी जांच होना जरूरी है। मामला सिर्फ मजदूरी तक ही सीमित नहीं है। केंद्र में कोसा और कोकून के उत्पादन को भी ज्यादा दिखाने की बात सामने आ रही है। बताया जाता है कि अधिक उत्पादन दिखाने पर शासन से अगले वर्ष अधिक बजट आवंटित होता है और केंद्र की ग्रेडिंग भी अच्छी होती है। ऐसे में उत्पादन के आंकड़ों में भी बढ़ोतरी कर बजट लेने का खेल चल रहा है ऐसा स्थानीय लोगों का आरोप है। नियमानुसार तमनार केंद्र में उत्पादित कोसे को महिला समूहों को शासन की निर्धारित रियायती दर पर बेचा जाना होता है ताकि वे धागा निर्माण और अन्य उत्पाद बनाकर आत्मनिर्भर बन सकें।
शासन के दस्तावेजों में भी यही दर्शाया गया है कि केंद्र ने इतने मजदूरों को रोजगार देकर उनके जीवन स्तर को सुधारा है और अपने उत्पाद को कम दर पर महिला समूहों को देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम किया है।लेकिन धरातल पर शासन की यह मंशा पूरी होती नहीं दिख रही है। हकीकत यह है कि आवंटित बजट का लाभ केंद्र में काम करने वाले गिने-चुने मजदूरों और कुछ ही समूहों को आंशिक रूप से ही मिला है। अधिकांश महिला समूहों को न तो नियमित रूप से कच्चा माल मिल रहा है और न ही उन्हें प्रशिक्षण का लाभ मिल पा रहा है। ऐसे में शासन द्वारा भेजा गया पूरा बजट कहां खर्च हो रहा है यह बड़ा सवाल है।इस पूरे मामले को लेकर जब रेशम विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों से पक्ष जानने की कोशिश की गई तो कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिल सका।
अधिकारियों का कहना है कि यदि लिखित शिकायत आती है तो नियमानुसार जांच कराई जाएगी। फिलहाल विभाग इस मामले में मौन है। कुल मिलाकर तमनार रेशम केंद्र का यह मामला अब चर्चा का विषय बन गया है। ग्रामीणों और जागरूक नागरिकों ने इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच कराने और दोषियों पर कार्रवाई के साथ-साथ वास्तविक गरीब मजदूरों और महिला समूहों को इसका लाभ दिलाने की मांग की है।


