
पोर्टल स्पेशल रिपोर्ट | पुसौर, 26 जून 2026
वर्ष 2021 से अब तक पुसौर ब्लॉक और तहसील क्षेत्र के मुख्य प्रशासनिक व राजनीतिक पदों पर लगातार एक वर्ग विशेष का दखल बना हुआ है। इसे लेकर क्षेत्र में तरह-तरह की चर्चाएं गर्म हैं। कुछ इसे महज संयोग मान रहे हैं, तो कुछ का सीधा आरोप है कि यह ‘कृत्रिम संयोग’ अपने लोगों को लाभ पहुंचाने और सियासी समीकरण साधने के लिए बिठाया गया है।
आम जनता के लिए बनी परेशानी का सबब
दलीय राजनीति करने वाले नेताओं के लिए भले ही यह व्यवस्था ‘लाभ का अवसर’ हो, लेकिन आम लोगों के लिए यह गले की फांस बन गई है। क्षेत्र के बहुसंख्यक समाज का एक बड़ा वर्ग खुद को इस व्यवस्था में पीड़ित और उपेक्षित महसूस कर रहा है।ताजा मामला जमीन अधिग्रहण से जुड़ा है, जहां एक व्यक्ति कथित अनियमित अधिग्रहण से तंग आकर आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर हो गया। घटना ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कभी दूसरे नंबर पर था बहुसंख्यक समाज, आज हाशिए पर
सूत्र बताते हैं कि यह वही बहुसंख्यक समाज है जिसने एकजुटता दिखाते हुए पिछले चुनाव में मजबूत दावेदारी पेश की थी और दूसरा स्थान हासिल किया था। आज हालात ये हैं कि उसी समाज के लोग कहीं ‘झंडा बरदार’ बने हुए हैं तो कहीं ‘फरमाबरदार’। आरोप है कि साधन और सुविधा के नाम पर केवल चंद चुनिंदा लोगों के काम निकाले जा रहे हैं, जबकि आम जन कथित कुशासन के घेरे में फंसा है।
‘हां में हां’ मिलाने की संस्कृति हावी
पुरानी कहावत “मियां बोले बीबी जी, जिस देश में रहना बिल्ली को चूहा ले गई, कहे तो हां जी हां जी कहना” आज पुसौर की राजनीति पर सटीक बैठ रही है। सलाहकार भी वही सलाह दे रहे हैं जो ‘बॉस’ को पसंद आए, भले ही उसमें बॉस और उसकी टीम का अहित हो रहा हो।
जांच प्रक्रिया पर भी उठे सवाल
सबसे चिंताजनक पहलू जांच प्रक्रिया का है। आरोप है कि असली दोषी को शिकंजे में लेने के बजाय पहले उससे जुड़े निर्दोष लोगों को तलब कर पूछताछ की जाती है। पूछताछ के दौरान ही निर्दोष को दोषी करार देने की कवायद शुरू हो जाती है। इससे लोगों का न्याय व्यवस्था से भरोसा उठ रहा है।
‘खैरात की राजनीति’ से नहीं आएगा सुशासन
विशेषज्ञों का मानना है कि खैरात बांटकर सुशासन की परिकल्पना करना सार्वभौमिक सुरक्षा की दृष्टि से उचित नहीं है। अक्सर देखा जाता है कि शासित वर्ग जब खैरात पाकर खुश होने की कोशिश करता है, तभी कोई आर्थिक असुरक्षा या आपराधिक घटना सामने आ जाती है, जिसमें खैरात से कई गुना ज्यादा खर्च हो जाता है। इसके बावजूद शासक वर्ग में खैरात वितरण का अहंकार इस कदर है कि व्यवस्था में बदलाव की उम्मीद कम दिखती है।
डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट क्षेत्र में चल रही चर्चाओं, स्थानीय सूत्रों और आम जनता की राय पर आधारित है। पोर्टल किसी वर्ग, दल या व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं है। सभी पक्षों का बयान आने पर खबर को अपडेट किया जाएगा।
संतों ने कहा है — “दान के देवैया पापी और दान के लेवैया पापी”। अर्थात देने वाले को देने का अहंकार होता है और लेने वाला अकर्मण्यता के कारण लेता है। यदि कर्मठता होती तो शायद यह स्थिति निर्मित नहीं होती।
‘ Might is Right’ के दौर में बदल रही न्याय की परिभाषा
आज ‘Might is Right’ यानी ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ के इस दौर में सत्य और न्याय की परिभाषा बदल चुकी है। ऐसे में आम जनों के सामने नई परिस्थितियों में ढलने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है, वरना व्यवस्था की चक्की में पिसना तय माना जा रहा है।
