
छठवें वेतनमान के 32 माह और सातवें के 27 माह का एरियर्स दबा, हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी नहीं दिया पैसा, स्वयं पहुंचा सरकार सुप्रिम कोर्ट और उसके नोटिस पर भी हाजिर नहीं हो रही सरकार के नुमाइंदे.

अविभाजित मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में अपने जीवन का स्वर्णिम काल प्रदेश की सेवा में देने वाले बुजुर्ग पेंशनरों की व्यथा आज केवल आर्थिक नहीं, बल्कि व्यवस्था की मंशा पर सवाल बन गई है। सवाल यह है कि क्या शासन जानबूझकर भुगतान टालना चाहती है?
निर्धारित वेतनमान का हक भी नहीं दे रही सरकार
शासन की अपनी ही निर्धारित वेतनमान योजना के तहत प्रत्येक दस वर्ष में महंगाई के अनुसार नया वेतनमान लागू होता है। इसी के तहत 01/01/2006 से छठवां वेतनमान लागू हुआ। कर्मचारियों को तो 01/01/2006 से एरियर्स सहित भुगतान कर दिया गया, लेकिन पेंशनरों को इसका लाभ 32 माह बाद 01/09/2008 से दिया गया और 32 माह का एरियर्स आज तक दबा कर रखा गया है। फिर 01/01/2016 से सातवां वेतनमान लागू हुआ, इसमें भी पेंशनरों को 27 माह बाद 01/04/2018 से लाभ दिया गया और 27 माह का एरियर्स आज तक नहीं दिया गया। ये कोई अतिरिक्त मांग नहीं, बल्कि शासन की अपनी योजना के तहत बन रही पेंशनरों की वैध बकाया राशि है।
एक ओर एक जनप्रतिनिधि कई-कई पेंशन का पात्र है, वहीं दूसरी ओर जीवनभर सेवा देने वाला पेंशनर अपनी एक पेंशन के एरियर्स के लिए हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक भटक रहा है। क्या यही बुजुर्गों का सम्मान है? पेंशनरों का कहना यदि जनप्रतिनिधि अपना पेंशन छोड़ देंगे तो हम भी अपनी-अपनी पेंशन राशि नहीं लेंगे.
हाईकोर्ट से जीते, सरकार पहुंची सुप्रीम कोर्ट, पर खुद हाजिर नहीं
छत्तीसगढ़ पेंशनधारी कल्याण संघ ने कई बार लिखित निवेदन, धरना-प्रदर्शन किया, लेकिन जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो 2023 में माननीय उच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़ी। माननीय उच्च न्यायालय ने पेंशनरों की मांग को जायज ठहराते हुए शासन को 90 दिनों के भीतर भुगतान का आदेश दिया। पेंशनरों ने आदेश की प्रति के साथ शासन से मांग की, लेकिन शासन ने भुगतान करने के बजाय डबल बेंच में अपील कर दी, जिसे न्यायालय ने खारिज कर दिया।इसके बाद शासन सर्वोच्च न्यायालय चली गई। सर्वोच्च न्यायालय ने 13/07/2026 को पेंशनरों को उपस्थिति दर्ज कराने का आदेश दिया, जिसका पालन पेंशनरों ने अधिवक्ता के माध्यम से कर दिया। लेकिन गंभीर बात यह है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के नोटिस जारी करने के बाद भी शासन आज तक अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा रही है और न ही जवाब प्रस्तुत कर रही है।
मंशा साफ – भुगतान टले या देना न पड़े
इससे शासन की मंशा साफ झलकती है। मकसद यही दिखता है कि किसी भी तरह से बुजुर्ग पेंशनरों के हक की यह राशि देने में देरी हो, या फिर इसे देना ही न पड़े। इसलिए हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है और वहां भी जवाबदारी से बचा जा रहा है।
शासन को चाहिए कि अदालती दांव-पेंच छोड़कर मानवीय दृष्टिकोण अपनाए और बुजुर्ग पेंशनरों की वैध बकाया राशि का तत्काल भुगतान करे।


