

त्रिस्तरीय पंचायतराज व्यवस्था के दौर में जब जनपद और जिला पंचायतों को शिक्षाकर्मी नियुक्त करने का अधिकार शासन द्वारा प्राप्त था, उस समय पुसौर क्षेत्र में नियुक्तियों को लेकर बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुई थीं। आरटीआई के माध्यम से अब यह तथ्य सामने आया है कि शैक्षणिक अंकों में प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाने के बाद कुछ अभ्यर्थियों ने कर्णबाधित होने का विकलांगता प्रमाण पत्र बनवाकर नियुक्ति प्रक्रिया में बढ़त हासिल कर ली। वहीं कुछ लोगों ने फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर भी शिक्षाकर्मी पद प्राप्त कर लिया।
जानकारों का कहना है कि यह खेल वर्ष 1995 से 2010 के बीच अपने चरम पर था। इस दौरान रसूखदार और समाज में अच्छी पकड़ रखने वाले परिवारों के लोगों ने इसका भरपूर लाभ उठाया। आज वही लोग बड़े शिक्षक बनकर बैठे हैं और नए-पुराने सभी शिक्षकों पर रौब झाड़ रहे हैं। कुछ तो नौकरी पाकर बाहर ऐश की जिंदगी व्यतीत कर रहे हैं।
इस पूरे प्रकरण में अनुकंपा नियुक्ति में भी बड़े पैमाने पर गड़बड़ी सामने आई है। शासन द्वारा अनुकंपा नियुक्ति का प्रावधान मृत कर्मचारी के परिजनों को आर्थिक राहत देने के उद्देश्य से किया गया था। लेकिन यहां नियमों को ताक पर रखकर ऐसे लोगों को भी नियुक्ति दे दी गई जिनका मृत कर्मचारी के परिवार से कोई संबंध ही नहीं था। उस समय यदि कोई शिक्षक सेवाकाल में मृत्यु को प्राप्त होता था तो उसका 11वीं पास बेटा या बेटी सीधे शिक्षक पद पर नियुक्त हो जाता था। ऐसे कई लोग आज भी पदस्थ हैं, जिनके पास न तो बीएड-डीएड की डिग्री है और न ही उन्होंने टेट की परीक्षा उत्तीर्ण की है।
आरटीआई से मिले तथ्यों में यह भी उजागर हुआ है कि फर्जी प्रमाण पत्र बनाने के लिए अभ्यर्थियों ने कई हथकंडे अपनाए। किसी स्कूल से अनुभव प्रमाण पत्र लेना, फर्जी खेल प्रमाण पत्र बनवाना, आरक्षण वर्ग में न आने के बावजूद किसी आरक्षित वर्ग के परिवार में शामिल होकर उनका सरनेम अपनाकर मूल जाति के आधार पर प्रमाण पत्र प्राप्त कर आरक्षण का लाभ लेना जैसे तरीके अपनाए गए। इन गंभीर आरोपों के संबंध में पुसौर के वर्तमान शिक्षा विभाग प्रमुख से पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका।
अब इन फर्जी प्रमाण पत्रों और फर्जी बहरे बनकर नौकरी पाने वाले शिक्षाकर्मियों पर जांच की तलवार लटक रही है। स्थानीय लोगों ने मांग की है कि शासन स्तर पर इस मामले की गहन जांच कराकर दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए, ताकि योग्य अभ्यर्थियों के साथ हुए अन्याय का निवारण हो सके।
