

रायगढ़ जिले के घरघोड़ा, आमापाली, हाटी, बर्रा, कुडुमकेला, धर्मजयगढ़ सहित कई रेशम केंद्रों की स्थिति अब ष्सरकारी इमारतष् से ज्यादा कुछ नहीं रह गई है जिला कार्यालय से सूचना के अधिकार में मिली जानकारी के अनुसार इन केंद्रों में सामग्री की खरीदी हुई, मजदूर काम कर रहे हैं और भुगतान भी हुआ। लेकिन जब इन्हीं केंद्रों पर पहुंचे तो न मजदूर मिले न अधिकारी। सिर्फ चौकीदार मिले जो बताते हैं कि एक अधिकारी के पास 4.5 केंद्रों का चार्ज है। वो हफ्ते में एक दिन आते हैं वहीं धर्मजयगढ व घरघोडा रेषम केन्द्र के बाहर ताला जडे हुये मिले, बर्रा रेषम केन्द्र में लगे हुये बोर्ड केवल टीना है उसमें कुछ भी लिखा हुआ नहीं है।
सूचना बोर्ड ऐसे कि अक्षर मिट चुके हैं। बमुश्किल शब्द पढ़ा जा सकता है। स्थानीय लोग खुलकर कह रहे हैं कि इन केंद्रों का इस्तेमाल अब पिकनिक और शासकीय जमीन बचाने के अलावा कुछ नहीं हो रहा। सूत्रों के हवाले से यह आरोप सामने आया है कि जिला रेषम अधिकारी पवार के आने के बाद से यह स्थिति निर्मित हुआ है।


छत्तीसगढ़ सरकार ने रेशम को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बताकर करोड़ों खर्च किए। मकसद था आदिवासी और ग्रामीण परिवारों को स्वरोजगार देना। लेकिन अगर केंद्र ही बंद हैं तो वो पैसा गया कहां? आरटीआई में दर्शाए गए मजदूर सामग्री और भुगतान के आंकड़े अगर जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते तो ये सीधे.सीधे शासकीय राशि के दुरुपयोग और गलत जानकारी देने का मामला बनता है। ये भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के दायरे में आता है। इस पूरे मामले में सबसे चिंताजनक बात जवाबदेही का अभाव है। जिला रेशम अधिकारी से संपर्क करने की कोशिश हुई पर बात नहीं हो पाई। ऐसे में सवाल उठता है कि निगरानी कौन करेगा? रेशम विभाग केंद्र और राज्य की संयुक्त योजना है। अगर रायगढ़ के केंद्रों का ये हाल है तो बाकी जिलों की स्थिति क्या होगी इसलिए जरूरी है कि उच्च स्तरीय जांच कमेटी बनाकर सभी केंद्रों का फिजिकल वेरिफिकेशन हो।
आरटीआई में दी गई गलत जानकारी देने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई हो, जियो.टैगिंग और सोशल ऑडिट को अनिवार्य किया जाए ताकि हर तिमाही में उत्पादन और मजदूरी का सच सामने आए। रेशम उद्योग छत्तीसगढ़ की पहचान हो सकता था। लेकिन पहचान तब बनेगी जब केंद्रों में कोशा बनेगा न कि सिर्फ फाइलों में। सरकार को तय करना होगा कि वो ष्कागजी रेशमष् को पालना चाहती है या ष्जमीनी रोजगारष् को। जनता का पैसा जनता के काम आए यही लोकतंत्र की मांग है। और मीडिया का धर्म है आईना दिखाना। ये खबर उसी धर्म का निर्वाह है।
