सत्ता और सियासी फैसले..

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लेख – राजकुमार साहू

हिन्दुस्तान के इतिहास में सत्ता के कई सियासी फैसले गैर जरूरी रहे हैं, उन्हीं में से एक, योजनाओं के नाम को बदलने के फैसले रहे हैं।देश में या किसी सूबे में सरकार बदलते ही योजनाओं के नाम बदले जाते रहे हैं।यह फैसले, सत्ता और सरकार के निजी फैसले लगते हैं. सरकार किसी भी राजनीतिक पार्टी की रही हो, ऐसे सियासी फैसले लेने में कोई गुरेज नहीं किया गया। सरकार बदली, उसके बाद तय मानिए, योजनाओं के नाम बदले गए।कांग्रेस ने अपनी पार्टी या दूसरे महापुरुषों के नाम पर योजना बनाई। ऐसे ही बीजेपी की सरकार आई तो ये भी अपनी पार्टी के नेताओं के नाम पर योजना का नाम रखने पीछे नहीं रही।आजाद भारत में अधिकतर वक्त कांग्रेस ने सत्ता चलाई और योजनाओं का नामकरण भी पार्टी के नेताओं के नाम पर किया गया। इसी सियासी तानेबाने में बीजेपी भी खुद को नहीं उबार पाई और बड़े नेताओं की खिदमत में आगे रही।कह सकते हैं, जिनके पास सत्ता आई, उन्होंने योजनाओं को लेकर सियासी खेल खेला।योजनाओं के नामकरण को लेकर हमारा मानना है कि योजना का नाम ऐसा रखा जाए, जिसे कोई भी सरकार आए-जाए, बदलने की जरूरत ना पड़े। केंद्र और राज्य सरकार की कुछ योजनाएं चल रही है, जिनका प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के नाम के साथ नामकरण है। ऐसी योजना बनने से सत्ता बदलने के बाद भी उन योजनाओं के नाम पर फर्क नहीं पड़ता, लेकिन जब किसी योजना के साथ सियासी नाम जुड़ जाता है तो उन योजना के नाम का वही हश्र होता है, जैसे अब तक हश्र होते आया है।सरकार यह भी कर सकती है कि योजनाएं उन लोगों के नाम पर बनाएं, जिन्होंने अपना जीवन देश-प्रदेश को समर्पित किया हो, महान विभूति के नाम पर योजनाओं के नाम रखे जाएं, ताकि सत्ता और सरकार बदलने पर कोई भी फर्क ना पड़े।यह तो तय है कि कोई सियासी नाम होने से जैसे हालात अब तक बने हैं, वह आगे भी बनते रहेगा।सियासी नाम से बनी योजनाओं के पीछे, राजनीतिक खुशामद किसी से छिपी नहीं है. योजनाओं के नाम बदलने के पीछे की राजनीतिक सोच भी देश और सूबे की जनता को जरूर समझ आती है।योजनाओं के बेजा सियासी इस्तेमाल का विरोध भी होते आया है, लेकिन सत्ता के दमखम के आगे ऐसा विरोध अब तक दम तोड़ते रहा है।

योजनाओं के नामकरण को लेकर छत्तीसगढ़ में एक बार फिर सियासी फैसले लिए गए हैं।छग में अभी कांग्रेस की नई सरकार बनी है। 15 बरस बाद कांग्रेस सत्ता में आई है।छग में 45 दिनों की कांग्रेस सरकार ने अब तक जनहित के अपने त्वरित फैसले ने लोगों का दिल जीता था, लेकिन जिस तरह पिछली बीजेपी सरकार द्वारा शुरू की गई कुछ योजनाओं के नाम बदले हैं, उसके बाद इस सियासी फैसले को लेकर भी चर्चा छिड़ गई है। छग में बनी कांग्रेस की नई सरकार ने बेहद ही कम दिनों में किसान हित में कई बड़े फैसले लिए।बजट में भी किसानों को ही फोकस किया गया है, इसकी तारीफ हो रही है. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में चल रही कांग्रेस की सरकार ने 45 दिनों में बेहतर काम किया है. सरकार के एक-दो फैसलों पर सवाल जरूर खड़े हुए, लेकिन अभी जिस तरह योजनाओं के नाम बदले गए, इसे सियासी फैसले ही माना जा रहा है. योजना के नामकरण के ऐसे सियासी फैसले केवल कांग्रेस ने ही लिया है, ऐसा नहीं है। बीजेपी भी ऐसे सियासी फैसले लेने कहीं भी पीछे नहीं रही है।
छग में बीजेपी की सरकार बनी थी तो इस वक्त भी योजनाओं के नाम बदले गए थे।उस दौरान राजीव गांधी वाचनालय के नाम को बदल दिया गया था और आत्मानन्द वाचनालय नाम दिया गया था।ऐसे ही आवासों को लेकर भी बीजेपी सरकार ने जो योजनाएं बनाई, उन योजनाओं का नामकरण भी सियासी नाम से किया गया।अभी कांग्रेस की कांग्रेस सरकार ने पं. दीनदयाल उपाध्याय के नाम से पूर्ववर्ती बीजेपी सरकार द्वारा बनाई गई योजना के नाम को बदला है और योजनाओं के नाम इंदिरा, राजीव के नाम पर रखी हैं।
ऐसे सियासी फैसले केवल छग में होते रहे हैं, ऐसा नहीं है. योजनाओं के नामकरण को लेकर हिंदुस्तान का इतिहास खंगालें तो दर्जनों ऐसे उदाहरण मिलेंगे, जब सरकार बदलने के बाद योजनाओं के नाम बदलते रहे हैं। जिनके पास सत्ता रही, जिस भी पार्टी की सरकार रही, वे ऐसे सियासी फैसले लेने खुद को दूर नहीं रख सकी।
सियासी नाम से योजनाओं का नामकरण कतई ठीक नहीं है। योजनाओं के ऐसे नामकरण नहीं होने चाहिए। योजनाओं के नाम ऐसे रखे जाएं, जिस पर सत्ता और सरकार बदलने का कोई असर ही ना हो।ऐसी पहल होने से योजनाओं के नामकरण के बहाने सियासी हथकंडे अपनाए जाते हैं और सियासी खुशामद की जाती है, वह भी बन्द होगी।आजाद भारत में योजना बनाने और उसका नाम बदलने के ढेरों मामले हैं।सरकार बदलते ही यह चर्चा आम हो जाती है कि अब किन-किन योजनाओं के नाम बदले जाएंगे ? सत्ता का सियासी दांव भी ऐसा कि सत्ता और सरकार भी इससे पीछे नहीं हटती, क्योंकि योजना का नामकरण ऐसे सियासी नाम से किया जाता है, जिनका राजनीतिक पार्टी से जुड़ाव रहा है।कुछ विभूति के नाम पर योजना बनती रही हैं।हालांकि, ऐसे नाम पर योजना बनाने पर उसके पीछे भी राजनीतिक नफे की चर्चा आम रहती है।
हमारा मानना है कि सरकारी योजनाओं का नाम ऐसे रखे जाएं, जिस पर सत्ता और सियासी दखल ना रहे।देश और प्रदेश में कई सरकारी योजनाएं चल रही है, जो प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के नाम पर बनी हैं। ऐसी योजनाओं के नामकरण होने से सत्ता और सरकार बदलने का कोई फर्क नहीं पड़ता।हमारा यह भी कहना है कि देश या प्रदेश के ऐसे विभूति या जीवन समर्पित करने वालों के नाम पर भी योजनाओं के नाम रखे जा सकते हैं। ये ऐसे नाम हो, जिनके नाम पर सियासी मुहर ना हो, सरकार और सत्ता बदले, लेकिन योजना का नामकरण प्रदेश या देश की अस्मिता से जुड़ जाए, ताकि योजनाओं का दूसरा नामकरण कोई सरकार ना कर सके।इसके दो फायदे होंगे, एक तो उन विभूति के नाम योजना बनने से उनका गौरव बढ़ेगा और दूसरा  उन योजना के माध्यम से युवा व नई पीढ़ी, उनके व्यक्तित्व के साथ उनके प्रशंसनीय कार्यों से अवगत होंगे। योजना के साथ सरकार और सत्ता का रसूख का जोर भी नहीं चलेगा और दशकों से सरकारी योजना का नाम बदलने के जो सियासी फैसले होते आए हैं, उस पर भी लगाम लगेगी. सियासी खुशामद की इस प्रवृत्ति पर तभी रोक लगेगी, जब सियासी लोगों के नाम पर योजनाओं का नामकरण बन्द होगा। एक नई व्यवस्था की अब शुरुआत होनी चाहिए। योजनाओं का नामकरण केवल राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए नहीं होना चाहिए. नामकरण ऐसा हो, जिससे देश और प्रदेश के लोग उस योजना से जुड़े।. योजनाओं को नामकरण के नाम पर बांटने की कोशिश नहीं होनी चाहिए, बल्कि देश और सूबे की आवाम को योजनाओं का लाभ कैसे मिले, कैसे योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन हो, इस पर सरकार और सत्ता की ऊर्जा लगनी चाहिए। ऐसा होगा तो योजनाओं की पहचान बनी रहेगी और जनता से भी अपनापन बना रहेगा।. अन्यथा, सरकारी योजना तो बनती रहती है, लेकिन जनता के जीवन को बदलने में कितनी योजना कारगर बनी है, यह किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में कहा जा सकता है कि योजना का नाम ऐसे रखें, जिसका सियासी लाभ से कोई लेना-देना ना हों|

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