मृत्यु भोज के बजाए कराएं जरूरतमंदों को भोजन… मैंने भी किया

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हरि अग्रवाल…

 

मां का नाम आते ही ममता उमड़ने लगती है। बच्चे को नौ माह गर्भ में रखने की पीड़ा एक मां ही महसूस कर सकती है। बच्चा जब दुनिया में आता है तब से अपनी अंतिम सांस तक मां अपने बच्चों को सदा आशीर्वाद ही देती है। बीते 20 मार्च को जब मेरी मां ने एनकेएच हाॅस्पिटल चांपा में अंतिम सांस ली तो कुछ पल के लिए ये दुनिया दुश्वार लगने लगी। लेकिन जीवन और मृत्यु की सच्चाई को स्वीकार करते हुए मैंने अपने साथ ही परिवार को संभालने हरसंभव प्रयास किया। इस दुख की घड़ी में मेरे मित्रों ने कंधे से कंधा मिलाकर जो साथ दिया, वह हृदय की गहराइयों में सदा जीवित रहेगा। इस बीच अमन पथ और सीजी लाइव न्यूज में खबरों का प्रकाशन व प्रसारण ठप रहा। लेकिन जल्द ही नई उर्जा और नए अंदाज में अमन पथ और सीजी लाइव न्यूज में खबरें फिर से आने लगेंगी।

कात्रेनगर के दीन-दुखियों को भोजन कराकर मिली आत्मिक संतुष्टि

हिन्दू समाज में जब किसी परिवार में मौत हो जाती है, तो सभी परिजन बारह दिन तक शोक मनाते हैं। इसके बाद तेरहवीं का संस्कार होता है, जिसे एक जश्न का रूप दे दिया जाता है। इस भोज में सभी को पुरी और अन्य व्यंजन परोसे जाते हैं। अब प्रश्न उठता है क्या परिवार में किसी प्रियजन की मृत्यु के पश्चात इस प्रकार से भोज देना उचित है? क्या यह हमारी संस्कृति का गौरव है कि हम अपने ही परिजन की मौत को जश्न के रूप में मनाएं? मुझसे व्यक्तिगत रूप से जुड़े लोग जानते हैं कि मैं मृत्यु भोज के खिलाफ रहा हूं। क्योंकि दुखी मन, रोते हुए आंख और अपनों को सदा के लिए खोने वालों के यहां भोजन क्या पानी भी पीना मुझे नागवार गुजरता रहा है। इसलिए मैंने इलाहाबाद में 12वां संस्कार कराने के बाद 13वें दिन कात्रेनगर सोठीं जाकर वहां की दीन-दुखियों को भोजन कराया। इस कार्य से मुझे जो आत्मिक संतुष्टि मिली, उसका बयां शब्दों में नहीं किया जा सकता। इस कार्य में कात्रेनगर परिवार के अलावा अखिलेश कोमल पाण्डेय, अब्दुल गफ्फार खान, शिक्षक लक्ष्मीनारायण तिवारी सहित अन्य लोग सहभागी बने।

दिल की गहराईयों में हमेशा जिंदा रहेगी मेरी मां

करीब डेढ़ साल पहले जब मेरी मां श्रीमती आरती देवी अग्रवाल की पहली दफा तबीयत खराब हुई तो उन्हें किम्स बिलासपुर में भर्ती किया गया। वहां से करीब एक माह बाद डिस्चार्ज तो हो गया, लेकिन उनकी हालत में सुधार नहीं हो सका। करीब एक साल तक किम्स बिलासपुर का ट्रीटमेंट चलता रहा, लेकिन मां के स्वास्थ्य में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। ऐसे में एनकेएच हाॅस्पिटल कोरबा के न्यूरो सर्जन डाॅ. मित्तल ने मां का उपचार शुरू किया। डाॅ. मिततल के उपचार से मां की न्यूरो संबंधी समस्या काफी हद तक ठीक हो गई थी। करीब डेढ़ साल तक तन, मन व धन से मां की सेवा करने कोई कसर नहीं छोड़ा, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। हालांकि मां इस दुनिया से चली गई, लेकिन दिल की गहराईयों में वो हमेशा जिंदा रहेगी। लव यू मां…..

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