दसवी में दो बार फेल और बारहवीं में पूरक के बावजूद राजकिशोर ने बी लिब कर दिखाया टाॅप…

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हरि अग्रवाल…

द रियल हीरो में आज हम एक ऐसे शख्स की स्टोरी लेकर आए हैं, जो बार-बार गिरने के बावजूद हर बार उनका हौसला बढ़ता गया। कक्षा दसवीं में दो बार फेल होने के बाद तिलई गांव के राजकिशोर धिरही लोगों के बीच मजाक बन गया। लोगों के तानों से उसके लिए दुनिया दुश्वार हो गई। वो अंदर से इतना टूट गया था कि उसने मौत को गले लगाने तक की सोच ली थी, लेकिन किसी तरह वो हिम्मत जुटाकर आगे बढ़ने लगे। आलम यह है कि आज उसने बी लिब की परीक्षा में पूरे विश्वविद्यालय में प्रावीण्य सूची में अपना नाम दर्ज कराया। पेश है धिरही के जीवन से जुड़े कई ऐसे रहस्य, जिससे लोग अंजान हैं।

जिला मुख्यालय जांजगीर के समीपस्थ ग्राम तिलई निवासी राजकिशोर धिरही ने अपने हौसलों से असफलताओं को ही बौना कर दिया। घर की माली हालत उतनी अच्छी नहीं है, फिर भी उनमें आत्मविश्वास कूट-कूटकर भरा है। वह वर्ष 1992 में कक्षा दसवी की परीक्षा में फेल हो गया। इसके बाद उसने 1993 में फिर से कक्षा दसवी की परीक्षा दी, लेकिन इस बार भी उसे असफलता ही हाथ लगी। इसके बाद लोग उससे दूरी बनाने लगे। यहां तक रिश्तेदार भी उसके खिलाफ बात करने लगे थे। लोगों के ताने उसे जहर के घूंट लगते थे। लोगों से मिल रही उपेक्षा से वह पूरी तरह टूट गया। इस घटना ने उसे अंदर तक झकझोर दिया। दो बार फेल होने के बाद फिर परीक्षा देने घरवाले तैयार नहीं हुए। ऐसे में राजकिशोर ने हिम्मत हारने के बजाय आगे बढ़ने का निश्चय किया। उसने आगे की पढ़ाई के लिए मजदूरी करनी शुरू की। उसने पान बेचा। यहां तक साइकिल में घूम-घूमकर ब्रेड तक बेचा। किसी तरह पैसे जुटाकर धिरही ने काफी ध्यान देकर फिर से दसवीं की परीक्षा दी। इस बार वो सफल रहा, लेकिन बारहवीं की परीक्षा में वो पूरक आ गया। उसने काफी लगन से पढ़ाई के बाद पूरक परीक्षा निकाल ली। इसके बाद पढ़ाई को चुनौती मानकर वो ऐसा आगे बढ़ा कि कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसने स्वध्यायी छात्र के रूप में बीए फस्ट ईयर पास कर पढ़ाई पर काफी ध्यान दिया। इस वजह से उसने बीए की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसके बाद आगे पढ़ने के लिए उसके पास पैसे नहीं थे। तब उसने वर्ष 2000 में खेत बेचकर बी लिब की पढ़ाई पूरी की। उसने विश्वविद्यालय में प्रावीण्य सूची में दूसरा स्थान बनाया। हालांकि वर्ष 2001 में एम लिब की परीक्षा में वह फिर पूरक आ गया, पर अपने मेहनत से वह विश्वविद्यालय में सर्वोच्च नंबर पर रहा। इसके अलावा उसने इतिहास, राजनीति, समाज शास्त्र व हिन्दी में एमए किया। साथ ही बीएड व आईटीआई भी उसकी शिक्षा में शामिल है। पढ़ाई पूरी करने के बाद उसकी रुंगटा इंजीनियरिंग कालेज में सहायक ग्रंथपाल की नौकरी लगी थी, लेकिन वह भी छुट गई। उसके बाद राजधानी रायपुर में मार्केटिंग के दौरान दफ्तर व गलियों में चूड़ी व पेन बेचता रहा। आज व्याख्याता पंचायत के पद पर शासकीय हाईस्कूल पड़रिया अकलतरा में कार्यरत है।

देहदान तक कर दिया
भगवान ने इस दुनिया में हर किसी को एक उद्देश्य से भेजा है, लेकिन यहां आने के बाद लोग एक ही ढर्रे पर चलने लगते हैं। पढ़ाई-लिखाई के बाद विवाह और बच्चे। इन सबसे जो हटकर कुछ सोचकर है वही मरने के बाद याद किए जाते हैं। धिरही भी ऐसा शख्स है, जिसे मरने के बाद भी याद किया जाएगा। लोग दान में महज अनाज व चंद पैसे देने से कतराते हैं, लेकिन धिरही ने अपना देहदान कर दिया है। उसने मृत्यु उपरान्त सिम्स बिलासपुर को देहदान करने का वचन पत्र दिया है, ताकि मरने के बाद भी मेडिकल कालेज के विद्यार्थियों के काम आ सके। श्री धिरही का लोगों के लिए संदेश है अनुशासन में रहकर मेहनत करो, मंजिल अवश्य मिलेगी। शिक्षा से जीवन में खुशहाली आती है।

राजकिशोर का परिचय

नाम – राजकिशोर धिरही

पिता – एमएल धिरही

जन्म – 03 नवंबर 1976

शिक्षा – -एम.ए(इतिहास,राजनीति,समाज,हिन्दी)एम.लिब,बी.एड,आई.टी.आई।

उपलब्धि – बी.लिब में प्रावीण्य द्वितीय (2001)

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