दलगत राजनीति से चांपा का हुआ सत्यानाश, इस बार निर्दलीय अध्यक्ष बनने की प्र्रबल संभावना, कई बड़े नेता चुनाव जीतने के बाद कभी चांपा का उद्धार करने नहीं सोचा @ हरि अग्रवाल

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जांजगीर-चांपा। चांपा नगरपालिका चुनाव में इस बार निर्दलीय अध्यक्ष बनने की संभावना जताई जा रही है, क्योंकि शहर के विभिन्न ज्वलंत मुद्दों को लेकर हमेशा से पक्ष और विपक्ष खुद को किनारा करता रहा है। इसके चलते पक्ष और विपक्ष पर हमेशा आपस में भाईचारे का आरोप लगता रहा है। इसके अलावा 15 साल भाजपा और इस बार पांच साल कांग्रेस को मौका दिया गया। लेकिन दोनों ही दल के नेता जनता की अपेक्षाओं में खरा नहीं उतर पाए। इस वजह से यदि इस बार कोई साफ सुथरा चेहरा अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ता है तो उसके जीतने की संभावना काफी प्रबल हो जाता है।

आपकों बता दें कि कागज में भले ही जांजगीर-चांपा जिला अंकित है, लेकिन स्थानीय नेताओं की निष्क्रियता से हमेशा से चांपा उपेक्षित रहा है। इसी उदासीनता के चलते जांजगीर चांपा जिला के बजाय अब नेता व अफसर भी सिर्फ जांजगीर जिला संबोधित करने लगे हैं। यहां तक जिला मुख्यालय सिर्फ जांजगीर है जबकि चांपा के नसीब से सिर्फ बदहाली है। एक समय था जब चांपा की पहचान यहां की विभिन्न विशेषताओं से होती थी लेकिन अब चांपा की पहचान कीचड़ जीर्ण-शीर्ण स़ड़क और गड्ढे से हो रही है।ं चांपा नगरपालिका क्षेत्र के लिए बीते पांच सालों में करोड़ों के विकास कार्य सेंशन हुए, लेकिन चांपा नगरपालिका अध्यक्ष का दुर्भाग्य है कि 80 से 90 प्रतिशत कार्य अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। चांपा के गौरवपथ, रेलवे ओवरब्रिज, रामबांधा तालाब, पेयजल आपूर्ति आदि कई ज्वलंत मुद्दे है, जिसे लेकर चांपा की जनता भाजपा और कांग्रेस से चिढ़ी हुई है और वो इस बार चुनाव में दोनों को मजा चखाने के मूड में है। यह बात कई बार शहर के लोग सोशल मीडिया में बेबाक बोल चुके हैं। आपकों बता दें कि चांपा से कई बड़े नेता चुनाव जीत चुके है लेकिन कुर्सी मिलने के बाद किसी ने चांपा की ओर ध्यान नहीं दिया। इसके चलते आज चांपा की दशा बेहद चिंताजनक है।

रामबांधा तालाब बदहाल
चांपा के लिए रामबांधा तालाब हमेशा से सूर्खियों में रहा है। भाजपा के दौर में उसके सौंदर्यीकरण के नाम लाखों खर्च किया गया, लेकिन बदहाली दूर नहीं हुई। इसके बाद जब नपा में जब कांग्रेस की सत्ता आई तो रामबांधा तालाब सौंदर्यीकरण के लिए करीब आठ करोड़ सेंशन हुआ। इसके कार्य प्रारंभ को लेकर भी काफी राजनीति हुई तो वहीं तालाब के लिए रकम सेंशन कराने को लेकर नेताओं ने खूब वाहवाही लुटी। लेकिन तीन सालों से तालाब अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है तो उसकी सुध किसी को नहीं है, जबकि इतने बड़े तालाब को सूखा देने के बाद जिस तरह पानी की किल्लत हो रही है उसे लेकर शहर के लोग इन्हें कभी माफ नहीं करेंगे।

गौरवपथ का कबाड़ा
एक समय था जब चांपा के लोगों को गौरवपथ पर नाज था लेकिन जब से इस मार्ग में शराब दुकान शुरू हुई तब से इसकी उल्टी गिनती शुरू हो गई। उस समय नपाध्यक्ष पर ही शराब दुकान के लिए जगह मुहैया कराने का आरोप लगा। इसके बाद जब गौरवपथ से भारी वाहनों को गुजारने की अनुमति दी गई तब भी नपाध्यक्ष को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया गया। भारी वाहनों के चलते गौरवपथ का सत्यानाश हो गया। आज शहर का सबसे खराब मार्ग यही है। बीते दो सालों से शहर के लोग इस गौरवपथ की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं लेकिन दलगत राजनीति के चलते शहर के लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। इस बार चुनाव में यह अहम मुद्दा होगा।

ब्रिज की गंभीर समस्या
चांपा का गौरवपथ शहर के लिए ज्वलंत मुद्दा है लेकिन यह भी दलगत राजनीति की भेंट चढ़ गया है। सात साल बाद भी ब्रिज का निर्माण पूरा नहीं हो सका है। इस ब्रिज की वजह से जहां कईयों की रोजी रोटी छीन गई तो फाटक बंद होने के बाद लोगों को आवागमन में काफी दिक्कतें हो रही है। हालांकि अभी इस समस्या के लिए शहर के कुछ लोगों ने रेल प्रशासन को जगाने नगाड़ा बजाया था तो वहीं राज्य में जब भाजपा की सरकार थी तब पूर्व नपा उपाध्यक्ष ने भी आंदोलन किया था। लेकिन इसके बाद किसी ने इस ओर प्रयास नहीं किया। अभी ब्रिज की वजह से पूरा स्टेशन क्षेत्र को पार करने में पसीना छूट जा रहा है। इससे लोग आक्रोशित हैं।

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