करोड़ों का जिला अस्पताल बना महज रेफर सेंटर, अधिकांश मामलों में मरीज को दिखाया जा रहा बिलासपुर व रायपुर का रास्ता…

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जांजगीर-चांपा। जिला अस्पताल रेफर सेंटर बनकर रह गया है। जिला अस्पताल में आए दिन दुर्घटना व घटना से संबंधित दर्जनों मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं, लेकिन प्रथम व द्वितीय श्रेणी के अधिकांश पद खाली होने का खामियाजा उन्हें जान देकर भुगतना पड़ रहा है। ज्यादातर मरीजों को इलाज के लिए बिलासपुर या रायपुर रेफर कर दिया जाता है। मरीज की गंभीर हालत के कारण वे रास्ते में ही काल के गाल में समा जाते हैं। अस्पताल में संसाधन के भी पुख्ता इंतजाम नहीं है, जिसका खामियाजा मरीजों को जान देकर भुगतना पड़ रहा है।

जिला बनने के 19 साल बाद भी यह जिला स्वास्थ्य सुविधा के मामले में काफी पीछे है। जिला अस्पताल में विभिन्न रोग विशेषज्ञों सहित कुल 79 पद स्वीकृत है, लेकिन वर्तमान में यहां दर्जनभर विशेषज्ञ ही कार्यरत हैं। विभिन्न बीमारियों से पीड़ित मरीज बेहतर इलाज की आस लेकर यहां पहुंचते हैं, लेकिन उन्हें मायूसी ही हाथ लग रही है। यही वजह है कि मामलों में पीड़ितों को बिलासपुर या रायपुर रेफर कर दिया जाता है। जिला अस्पताल में यदि सेटअप के अनुसार विशेषज्ञ चिकित्सकों की पदस्थापना हो जाए तो विभिन्न बीमारियों का इलाज यहां सहज ही हो जाएगा। विडंबना है कि डेढ़ दशक बाद भी यहां के अधिकांश पदों को विशेषज्ञों का इंतजार है। जिला अस्पताल की स्थिति को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है ग्रामीण क्षेत्रों के अस्पतालों का क्या हाल होगा। जिला अस्पताल में सीएमएचओ व सिविल सर्जन कार्यरत हैं, लेकिन जिला परिवार कल्याण अधिकारी, जिला टीकाकरण अधिकारी व जिला क्षय नियंत्रण अधिकारी के एक-एक पद अब भी खाली है। मेडिसीन विशेषज्ञों के 11 के 11 पद खाली है। सर्जरी व शिशु रोग विशेषज्ञों के 11 11 पदों में से मात्र 1 1 की पदस्थापना है। स्त्री रोग विशषज्ञों के यहां 11 पद स्वीकृत हैं, लेकिन यहां मात्र दो की पदस्थापना है। यही हाल अन्य प्रथम श्रेणी विशेषज्ञ चिकित्सकों का है। द्वितीय श्रेणी विशेषज्ञों की भी यहां स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है। पीजीएमओ भेषज व स्त्री रोग के एक-एक पद खाली है, वहीं जिला मलेरिया अधिकारी, जिला प्रशिक्षण अधिकारी, प्रशासकीय अधिकारी व मैट्रेन के एक-एक पद अर्से से रिक्त है। चिकित्सा अधिकारी के 85 पदों में से 22 पद खाली है। उल्लेखनीय है कि अस्पताल में हर साल स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर करोड़ों रुपए व्यय किया जाता है, लेकिन स्टाफ की कमी के कारण मरीजों को स्वास्थ्य लाभ नहीं मिल पा रहा है।

क्लीनिक में व्यस्त रहते हैं डाॅक्टर
पहले ही जिला अस्पताल स्टाफ की समस्या से जूझ रहा है। इसके बाजवूद यहां कार्यरत डाक्टर अस्पताल में सेवा देने के बजाय ज्यादातर समय अपने क्लीनिक में व्यस्त रहते हैं। बीमारी से पीडि़त मरीज अस्पताल के विभिन्न वार्डों में दर्द से कराहते रहते हैं, लेकिन उनकी सुध लेने से ज्यादा डाक्टरों को अपनी ऊपरी कमाई की चिंता रहती है। हालांकि यहां बायोमैट्रिक मशीन लगने के बाद चिकित्सकों की उपस्थिति का ग्राफ बढ़ा है, लेकिन स्टाफ व संसाधन की कमी खल रही है।

जनप्रतिनिधियों की उदासीनता चरम पर
क्षेत्र के जनप्रतिनिधि सिर्फ चुनाव के समय ही लोगों को नजर आते हैं, जबकि बाकी दिनों में उनका दर्शन दुर्लभ हो जाता है। चुनाव जीतने के बाद वे जनहित के बजाय निजी लाभ को ज्यादा महत्व देते हैं। लोग विभिन्न समस्याओं को लेकर उनका चक्कर लगाते रहते हैं। यही वजह है कि क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों ने भी अस्पताल के स्टाफ व संसाधन की समस्या पर आवाज बुलंद नहीं की। इसके कारण डेढ़ दशक बाद भी जिला अस्पताल अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है।

 

महेन्द्र देवांगन

संभागीय ब्यूरो

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